
पश्चिम बंगाल के SIR (Special Investigation Report) मामले में सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने पारदर्शिता को लेकर बड़ा और सख्त संदेश दे दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है—अब रिकॉर्ड में गड़बड़ी छिपेगी नहीं।
पंचायत और वार्ड ऑफिस में लगेगी ‘नामों की लिस्ट’
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक, अब पंचायत और वार्ड कार्यालयों के नोटिस बोर्ड पर उन सभी व्यक्तियों के नाम सार्वजनिक रूप से चिपकाए जाएंगे, जिनके रिकॉर्ड में किसी भी तरह की irregularity पाई गई है।
कोर्ट का मानना है कि इससे प्रभावित लोगों को समय रहते जानकारी मिलेगी। कोई भी व्यक्ति “मुझे पता ही नहीं था” कहकर अपने अधिकार नहीं खोएगा।
यह फैसला सीधे तौर पर Right to Information और Electoral Transparency को मजबूत करता है।
Documents जमा करने की Deadline बढ़ी — बड़ी राहत
Supreme Court ने एक अहम राहत देते हुए कहा है कि अगर आखिरी तारीख निकल चुकी है, तब भी documents accept किए जाएंगे। व्यक्ति खुद न जाकर अपने representative के ज़रिए भी कागज जमा करा सकता है। यानि अब सिस्टम यह नहीं कह पाएगा— “Date निकल गई, अगला नंबर!”
10 दिन में दर्ज कर सकेंगे आपत्ति
पंचायत या ब्लॉक ऑफिस में लिस्ट लगने के 10 दिनों के भीतर कोई भी व्यक्ति complaint या objection दर्ज करा सकता है। इसके लिए कोर्ट ने आदेश दिया है कि हर पंचायत और ब्लॉक ऑफिस में Special Help Desk बनाई जाए। लोगों को इधर-उधर भटकना न पड़े।
Law & Order पर Supreme Court सख्त
मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने ममता सरकार को साफ चेतावनी दी है:

“पूरी प्रक्रिया के दौरान राज्य में शांति बनी रहनी चाहिए। किसी भी तरह की हिंसा या अव्यवस्था बर्दाश्त नहीं होगी। चुनाव आयोग को जरूरत के मुताबिक staff और officers मुहैया कराए जाएं। प्रशासन की जिम्मेदारी होगी कि आम जनता को कोई परेशानी न हो।
Village Level Solution: शहर नहीं जाना पड़ेगा
ग्रामीणों को राहत देते हुए कोर्ट ने कहा है कि गांव की पंचायत और ब्लॉक लेवल पर ही verification और शिकायत समाधान केंद्र बनाए जाएं, अधिकारी मौके पर मौजूद रहेंगे और दस्तावेजों की जांच करेंगे।
मतलब अब “साहब शहर में हैं” वाला बहाना भी खत्म!
यह फैसला उन लोगों के लिए wake-up call है जो सोचते थे कि नाम गलत है तो क्या, सिस्टम खुद ठीक कर देगा।
Supreme Court ने साफ कर दिया है—अब transparency कोई option नहीं, compulsion है।
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